॥सदगुरुदेवाय नमः॥
श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय! राधा रानी की जय!
भक्तों, आज कामदा एकादशी के पावन अवसर पर हम श्रीमद्भगवद्गीता के पावन सत्र का शुभारंभ कर रहे हैं। आज इस श्रृंखला का प्रथम दिवस है, और हम इसकी भूमिका के संदर्भ में आपके समक्ष निवेदन कर रहे हैं।
वास्तव में, “गीता” कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं है। यह महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत 18 अध्यायों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंश है—कुछ वैसे ही जैसे रामचरितमानस में एक विशेष कांड का पाठ किया जाए। इसका महत्व इस कारण और भी अधिक बढ़ जाता है कि यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से प्रकट हुआ दिव्य ज्ञान है।
भगवान श्रीकृष्ण ने जानबूझकर इस उपदेश को युद्धभूमि में दिया—ना कोई मंच, ना पांडाल, ना व्यासपीठ—केवल एक योग्य शिष्य की खोज में। ऐसा शिष्य जो सम्पूर्ण वेद, उपनिषद और शास्त्रों का सार ग्रहण कर सके। वह योग्य शिष्य कोई और नहीं, स्वयं अर्जुन थे।
जब भगवान श्रीकृष्ण ने यह उपदेश दिया, तो श्रीव्यास जी ने उसे केवल “श्रीभगवान उवाच” के रूप में अभिव्यक्त किया। उन्होंने “श्रीकृष्ण उवाच” नहीं लिखा, क्योंकि श्रीकृष्ण किसी एक पक्ष के नहीं, अपितु समस्त प्राणियों के समभाव से स्वामी हैं। यही कारण है कि गीता में भगवान की वाणी को सर्वजनहिताय और सर्वमंगलकारी घोषित किया गया है।
व्यास जी कहते हैं—
“सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीता अमृतं महत्॥”
अर्थात, समस्त उपनिषदें गायें हैं, उनके दुधारु गोपाल स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं, अर्जुन बछड़ा हैं जिन्होंने ज्ञान रूपी अमृत का रसास्वादन किया, और सुधीजन अर्थात सुंदर बुद्धि वाले श्रद्धालु उसका पान करते हैं। यह अमृत केवल अर्जुन के लिए नहीं था, यह समस्त भक्तों के लिए दिव्य प्रसाद था—भगवंत और भक्त दोनों का प्रसाद।
भगवान ने यह उपदेश कुरुक्षेत्र में दिया—जो न केवल युद्धभूमि, अपितु धर्मक्षेत्र भी है। “कुरु” का अर्थ है कर्म, अर्थात कर्मभूमि, और “क्षेत्र” अर्थात वह भूमि जहाँ धर्म और अधर्म का निर्णायक संघर्ष होता है।
इस उपदेश के अंत में संजय ने धृतराष्ट्र को कहा—
“यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥”
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, जहाँ अर्जुन हैं, वहाँ निश्चित ही विजय, श्री, समृद्धि और धर्म की स्थापना होगी। यही सनातन सत्य है।
भगवद्गीता एक ऐसा अद्वितीय ग्रंथ है, जिसके अध्ययन से समस्त वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों का सार प्राप्त हो जाता है। यह दिव्य अमृत सुधी जनों के लिए, भक्तों के लिए, और ज्ञान के साधकों के लिए अनंत काल से अमूल्य धरोहर बना हुआ है।
भगवान ने स्वयं 18वें अध्याय में कहा—
“य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥”
जो मेरे इस परम रहस्य को निष्काम भाव से प्रचारित करता है, वह मुझे अत्यंत प्रिय होता है। वह मेरी पवित्र सेवा के माध्यम से मेरे धाम को प्राप्त करता है।
अतः, इस श्रृंखला के माध्यम से हम न केवल श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन करेंगे, अपितु उसका रसपान, मनन और आत्मसात भी करेंगे। यह प्रस्तावना आपके सामने आज प्रस्तुत है। कल से हम प्रथम अध्याय का पाठ आरंभ करेंगे, और उसके पश्चात प्रत्येक अध्याय की यथासंभव व्याख्या आप तक पहुंचाई जाएगी।
आइए, भगवान श्रीकृष्ण और उनके परमप्रिय भक्त अर्जुन को बारंबार प्रणाम करते हुए इस गीता रसामृत यात्रा की शुरुआत करें।
श्री राधे राधे! जय श्री राधे!
॥हरि: शरणम्॥