श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत – (श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 1)

॥श्री सदगुरुदेवाय नमः॥

श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय! राधे राधे!

जैसा कि आप प्रतिदिन हमारे भक्ति प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम का पाठ करते हैं, आज से हम उसमें एक विशेष आयाम जोड़ रहे हैं — श्रीमद्भगवद्गीता पर चर्चा की श्रृंखला। इसकी भूमिका आप पिछले ब्लॉग में चुके हैं। आज से हम उस दिव्य ज्ञान की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

गीता का उपदेश वास्तव में वहीं से प्रारंभ होता है जहाँ धृतराष्ट्र का प्रश्न उठता है। हम अर्जुन की बात से नहीं, अपितु गीता के प्रारंभिक श्लोक — “धृतराष्ट्र उवाच” — से आरंभ करते हैं।

गीता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जिस समय पांडु को श्राप प्राप्त हुआ और वे बद्रीनाथ के निकट पांडुकेश्वर में तपस्या करने चले गए, तब धृतराष्ट्र को राजा घोषित कर दिया गया। उस समय कौरव और पांडव एक साथ रहते थे, और दोनों का राज्य पर समान अधिकार था, जैसा कि दो भाइयों के पुत्रों के बीच होना चाहिए।

लेकिन दुर्योधन की बुद्धि भ्रष्ट थी, उसकी प्रवृत्ति अन्यायपूर्ण और कपटपूर्ण थी। अपने पुत्रों के प्रति धृतराष्ट्र का अंधा मोह न्याय से परे चला गया था। भगवान वेदव्यास ने स्वयं आकर धृतराष्ट्र को समझाया कि अन्याय मत करो, इससे गृहकलह होगा, युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।

परंतु मोहवश धृतराष्ट्र ने कहा, “मैं अपने पुत्र की कुटिल बुद्धि के आगे पराधीन हूँ।” इस पर वेदव्यास जी ने स्पष्ट कहा: “तुम राजा हो, पराधीन नहीं। यदि तुम्हारा पुत्र नहीं मानता, तो उसे कारागार में डाल दो।” लेकिन मोह के वशीभूत होकर वह न्याय के पक्ष में नहीं खड़े हुए।

वेदव्यास जी ने भविष्यवाणी की — “अब युद्ध होगा। और उसमें सत्य की विजय होगी, असत्य पराजित होगा।”

संजय को दिव्य दृष्टि:

धृतराष्ट्र को जब यह आभास हुआ कि युद्ध निश्चित है और पराजय भी संभावित है, तो वह भयभीत हुआ। उसने व्यास जी से विनती की: “मैं जन्म से नेत्रहीन हूँ, मैंने अपने पुत्रों को देखा तक नहीं। अब क्या मैं उन्हें मरते हुए भी नहीं देख पाऊँगा?”

व्यास जी ने धृतराष्ट्र के सेवक संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान कर दी। अब संजय बिना युद्धभूमि गए ही सारा दृश्य देख सकते थे और जो कुछ होता था, वह धृतराष्ट्र को सुना सकते थे।

गीता का आरंभ – “धृतराष्ट्र उवाच”

जब धृतराष्ट्र को ज्ञात हुआ कि युद्ध में भीष्म पितामह भी पराजित हो चुके हैं, तो उसने संजय से घबराकर पूछा:

“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥”

(श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 1)

यहाँ से गीता का उपदेश प्रारंभ होता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि धृतराष्ट्र ने यह नहीं कहा: “हमारे और पांडवों के पुत्रों ने क्या किया?” उसने कहा “मामकाः” — मेरे पुत्र, और “पाण्डवाः” — जैसे कि वे पराए हों। यहीं से “मेरे और पराए” की मानसिकता प्रकट होती है। यही भाव आगे चलकर युद्ध का कारण बनता है।

जब समता की दृष्टि लुप्त हो जाती है और “मैं” और “मेरा” प्रमुख हो जाता है, वहीं से संघर्ष आरंभ होता है। गीता का उपदेश इसी बिंदु से प्रारंभ होता है — अन्याय की मानसिकता से धर्म की ओर जाने की यात्रा।

आज का पाठ:

आज हमने श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का प्रथम श्लोक पढ़ा और समझा। इस श्लोक के माध्यम से गीता के उपदेश की गूढ़ पृष्ठभूमि स्पष्ट होती है। आगे के अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए दिव्य ज्ञान का विस्तृत विवेचन होगा।

श्री राधे राधे! जय श्री राधे!

2 thoughts on “श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत – (श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 1)”

  1. Karishma Agarwal

    बहुत सुंदर तरीके से समझाया पहला श्लोक ।

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