श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत – (श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 16)

॥श्रीसदगुरुदेवाय नमः॥
श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय! राधे राधे!

श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत श्रृंखला में आज हम श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्याय 1 के श्लोक 16 के अर्थ, भाव एवं शिक्षा इत्यादि के बारे में चर्चा करेंगे।

श्लोक 1.16

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥

श्लोक का अर्थ

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने ‘अनन्तविजय’ नामक शंख बजाया, और नकुल तथा सहदेव ने क्रमशः ‘सुघोष’ और ‘मणिपुष्पक’ नामक शंख बजाए।

श्लोक का भावार्थ

यह श्लोक पांडवों की तैयारियों को दर्शाता है। युधिष्ठिर का ‘अनन्तविजय’ नामक शंख उनके धर्म और सत्य की विजय का प्रतीक है। नकुल और सहदेव, जो रूप, विवेक और संयम के प्रतीक हैं, उनके शंख ‘सुघोष’ और ‘मणिपुष्पक’ आत्मबल और सुंदर संयोजन का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सब मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि पांडव पक्ष केवल बाहुबल से नहीं, बल्कि धर्म, विवेक, संयम और नेतृत्व के गुणों से भी युक्त है।

शिक्षा

  • सत्य और धर्म की राह पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजय प्राप्त करता है।
  • विविध गुणों से युक्त संगठन ही सशक्त और सफल होता है।
  • मौन गुणों (जैसे विवेक, संयम, सज्जनता) का मूल्य भी युद्धभूमि में महत्वपूर्ण होता है।
  • परिवार और संगठन में हर सदस्य की भूमिका आवश्यक और पूरक होती है।

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