श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत – (श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 18)

॥श्रीसदगुरुदेवाय नमः॥

श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय! राधे राधे!

श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत श्रृंखला में आज हम श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्याय 1 के श्लोक 18 के अर्थ, भाव एवं शिक्षा इत्यादि के बारे में चर्चा करेंगे।

श्लोक 1.18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश: पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहु: शंखान्दध्मुः पृथक् पृथक्॥

शब्दार्थ

द्रुपद: — राजा द्रुपद;
द्रौपदेयाः — द्रौपदी के पुत्र;
सर्वश: — सभी प्रकार से;
पृथिवीपते — हे पृथ्वी के स्वामी (धृतराष्ट्र);
सौभद्र: — सुभद्रा का पुत्र (अभिमन्यु);
महाबाहु: — महान भुजाओं वाला;
शंखान् — शंखों को;
दध्मुः — बजाया;
पृथक् पृथक् — अलग-अलग।

श्लोक का अर्थ

हे पृथ्वीपति! राजा द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और महाबाहु सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) ने भी सब ओर से अपने-अपने शंख बजाए।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण की ओर से अर्जुन के पक्ष में युद्ध की घोषणा के स्वरूप शंखनाद का वर्णन हो रहा है। यहाँ द्रुपद, द्रौपदी के पांचों पुत्र (प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ति, शतानिक, और श्रुतसेन) तथा वीर अभिमन्यु (अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र) द्वारा अलग-अलग शंख बजाने का उल्लेख किया गया है। यह एक प्रकार से धर्म और साहस का उद्घोष है।

शिक्षा

  • धर्म की रक्षा हेतु संगठित प्रयास आवश्यक हैं।
  • युद्ध चाहे बाह्य हो या आंतरिक (स्वभाव व विकारों के विरुद्ध), सामूहिक उत्साह और समर्पण से सफलता संभव है।
  • युवाओं की भागीदारी (जैसे अभिमन्यु) भी धर्म संग्राम में महत्वपूर्ण होती है।
  • हर योद्धा का शंख बजाना उसके आत्मबल, उत्साह और कर्तव्य के प्रति जागरूकता का प्रतीक है।

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धन्यवाद!

॥हरि: शरणम्॥

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