श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत – (श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 4)

श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 1, श्लोक 5

श्लोक

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः॥ 5 ॥

शब्दार्थ

धृष्टकेतुः – धृष्टकेतु, च – और, एकितानः – चेकितान, काशिराजः – काशी के राजा, वीर्यवान् – पराक्रमी,
पुरुजित् – पुरुजित, कुन्तिभोजः – कुन्तिभोज, शैब्यः – शैब्य, नरपुंगवः – श्रेष्ठ पुरुष।

सरल अर्थ

(दुर्योधन ने कहा) धृष्टकेतु, चेकितान, पराक्रमी काशी नरेश, पुरुजित, कुन्तिभोज और श्रेष्ठ योद्धा शैब्य भी पाण्डवों की सेना में हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य को यह बता रहा है कि पाण्डवों की सेना में कितने महान और पराक्रमी योद्धा शामिल हैं। वह चाहता है कि द्रोणाचार्य पाण्डव पक्ष को कमज़ोर न समझें और युद्ध के लिए पूर्ण सजग रहें। यहां वह पाण्डवों की ओर से लड़ने वाले राजाओं और योद्धाओं का नाम लेकर उनकी शक्ति और योगदान को रेखांकित कर रहा है।

शिक्षा

  • विपक्ष की ताकत का आंकलन करना बुद्धिमानी होती है।
  • कभी भी किसी को कम आंकने की भूल नहीं करनी चाहिए।
  • युद्ध चाहे शारीरिक हो या मानसिक—सजगता और सतर्कता आवश्यक है।
  • नेतृत्व के लिए आवश्यक है कि वह अपनी सेना को स्थिति का पूरा ज्ञान दे और प्रेरित करे।

॥हरि: शरणम्॥

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