॥श्रीसदगुरुदेवाय नमः॥
श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय! राधे राधे!
श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत श्रृंखला में आज हम श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्याय 1 के श्लोक 7 के अर्थ, भाव एवं शिक्षा इत्यादि के बारे में चर्चा करेंगे।
श्लोक 1.7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
शब्दार्थ
- अस्माकं — हमारे पक्ष के
- तु — परन्तु
- विशिष्टाः — प्रमुख
- ये — जो
- तान् — उन्हें
- निबोध — जानिए
- द्विजोत्तम — ब्राह्मणश्रेष्ठ (द्रोणाचार्य के लिए संबोधन)
- नायकाः — सेनापति
- मम — मेरे
- सैन्यस्य — सेना के
- संज्ञार्थम् — जानकारी हेतु
- ब्रवीमि — मैं बताता हूँ
- ते — आपको
श्लोक का सरल अर्थ
हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ (द्रोणाचार्य), अब आप हमारे पक्ष के उन प्रमुख वीरों को जानिए, जिन्हें मैं अपनी सेना के सेनापति रूप में आपके परिचयार्थ बताता हूँ।
भावार्थ
यहाँ दुर्योधन अपने पक्ष की प्रमुख योद्धाओं की जानकारी द्रोणाचार्य को दे रहा है। वह चाहता है कि उसकी सेना की भी शक्ति को कमतर न आंका जाए। इस श्लोक से यह भी झलकता है कि दुर्योधन को अपनी सेना की शक्ति पर गर्व है और वह अपने योद्धाओं को भी द्रोणाचार्य के समान सम्मानित करना चाहता है।
शिक्षा
- नेतृत्व में पारदर्शिता और रणनीतिक जानकारी साझा करना महत्वपूर्ण होता है।
- अपने सहयोगियों की क्षमताओं को पहचानना और उन्हें उचित सम्मान देना चाहिए।
- किसी भी संघर्ष या युद्ध में आत्मविश्वास आवश्यक है, किंतु उसके साथ विवेक भी होना चाहिए।
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