॥श्रीसदगुरुदेवाय नमः॥
श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय! राधे राधे!
श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत श्रृंखला में आज हम श्रीमद्भगवद्गीता जी केअध्याय 1 के श्लोक 4 के अर्थ, भाव एवं शिक्षा इत्यादि के बारे में चर्चा करेंगे।
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक 1.4 का गूढ़ अर्थ: नेतृत्व, टीमवर्क और जीवन की सीख
श्लोक 1.4
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।
श्लोक का पाठ
इस श्लोक में धृतराष्ट्र को संजय, युद्धभूमि का वर्णन करते हुए कौरवों के पक्ष के प्रमुख योद्धाओं की तुलना पांडवों की सेना के वीरों से कर रहे हैं।
श्लोक का अर्थ (शब्दार्थ सहित)
- अत्र – यहाँ (इस सेना में)
- शूराः – वीर योद्धा
- महेष्वासाः – महान धनुर्धारी
- भीम-अर्जुन-समाः – भीम और अर्जुन के समान (पराक्रमी)
- युधि – युद्ध में
- युयुधानः – युयुधान (सात्यकि)
- विराटः – विराट (मत्स्यराज)
- द्रुपदः – द्रुपद (पंचाल नरेश)
- च महारथः – और महान रथी (महाबलशाली योद्धा) हैं।
भावार्थ
संजय राजा धृतराष्ट्र को बताते हैं कि पांडवों की सेना में भी अत्यंत पराक्रमी और श्रेष्ठ योद्धा हैं। इनमें युयुधान, विराट, और द्रुपद जैसे महारथी हैं जो भीम और अर्जुन के समान युद्ध कौशल में निपुण हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पांडवों की सेना को कम आंकना मूर्खता होगी।
शिक्षा एवं प्रासंगिकता
- नेतृत्व में सहयोगियों का महत्व: यह श्लोक हमें सिखाता है कि कोई भी युद्ध (या जीवन की कठिनाई) अकेले नहीं लड़ा जा सकता।
- दूसरों की क्षमताओं का सम्मान: शत्रु की शक्ति को नकारना या उसे कम आंकना मूर्खता हो सकती है।
- योग्यता और सामर्थ्य पहचानना: पांडवों ने योग्य और विश्वसनीय योद्धाओं को साथ लिया, यह सफलता की कुंजी है।
- रणनीति का महत्व: केवल बल नहीं, योजना और टीमवर्क भी जरूरी है।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक जीवन के गूढ़ सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाता है। श्लोक 1.4 में दी गई जानकारी यह सिखाती है कि जब सामूहिक शक्ति और योग्यता साथ होती है, तो सफलता निश्चित होती है।
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धन्यवाद!
॥हरि: शरणम्॥