श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत – (श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 17)

॥श्रीसदगुरुदेवाय नमः॥
श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय! राधे राधे!

श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत श्रृंखला में आज हम श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्याय 1 के श्लोक 17 के अर्थ, भाव एवं शिक्षा इत्यादि के बारे में चर्चा करेंगे।

श्लोक 1.17

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥

श्लोक का अर्थ

काशीराज, जो अत्यंत उत्तम धनुर्धर थे; महारथी शिखण्डी; धृष्टद्युम्न, विराट और अपराजित सात्यकि—इन सब ने भी अपने-अपने शंख बजाए।

श्लोक का भावार्थ

इस श्लोक में उन अन्य वीर योद्धाओं का उल्लेख है जो पांडवों की सेना में थे। काशीराज की धनुर्विद्या, शिखण्डी का पराक्रम, धृष्टद्युम्न की सैन्य-नेतृत्व क्षमता, विराट की सामर्थ्य और सात्यकि की अपराजेयता—ये सब दर्शाते हैं कि धर्म की सेना केवल पांडवों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनमें महान योद्धाओं का भी समूह था। ये शंखनाद पांडव पक्ष की व्यापकता और विविधता को उजागर करते हैं।

शिक्षा

  • धर्म की रक्षा हेतु समाज के हर कोने से समर्थन मिल सकता है।
  • सत्य की राह में साथ देने वाले भी महान होते हैं, चाहे वे प्रमुख पात्र हों या सहायक।
  • एक संगठन की सफलता केवल शीर्ष नेतृत्व पर नहीं, अपितु प्रत्येक सदस्य की शक्ति और निष्ठा पर भी निर्भर करती है।
  • योग्यता, पराक्रम और अपराजेय आत्मबल धर्मयुद्ध में विजय के साधन बनते हैं।

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