श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत – (श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1, श्लोक 8)

॥श्रीसदगुरुदेवाय नमः॥
श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय! राधे राधे!

श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत श्रृंखला में आज हम श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्याय 1 के श्लोक 8 के अर्थ, भाव एवं शिक्षा इत्यादि के बारे में चर्चा करेंगे।

भगवद्गीता - अर्जुन और श्रीकृष्ण

चित्र: महाभारत के युद्ध में अर्जुन और श्रीकृष्ण

श्लोक 1.8

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥

शब्दार्थ:

  • भवान् – आप (गुरु द्रोण)
  • भीष्मः – पितामह भीष्म
  • कर्णः – महावीर कर्ण
  • कृपः – कृपाचार्य
  • समिति-ञ्जयः – युद्ध में विजयी
  • अश्वत्थामा – द्रोण का पुत्र
  • विकर्णः – दुर्योधन का भाई
  • सौमदत्तिः – बहलिक

श्लोक का अर्थ:

आप (गुरु द्रोण), पितामह भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, युद्ध में विजयी अश्वत्थामा, विकर्ण और बहलिक – ये सभी महान योद्धा हमारी सेना में सम्मिलित हैं।

भावार्थ:

दुर्योधन, गुरु द्रोण को अपनी सेना की ताकत बताकर यह दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी ओर से कई महायोद्धा युद्धभूमि में उपस्थित हैं। यह संदेश इसलिए है ताकि द्रोण पूरी शक्ति और निष्ठा से युद्ध करें। यह नेतृत्व की एक रणनीति है – जब आप अपने नेतृत्व को प्रेरित करना चाहते हैं तो उनकी शक्ति पर भरोसा जताना चाहिए।

शिक्षा:

  • किसी भी चुनौती का सामना करते समय अपनी टीम की क्षमताओं को पहचानें।
  • नेतृत्व में विश्वास और उत्साहवर्धन से टीम का मनोबल बढ़ता है।
  • हर युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि मानसिक शक्ति और विश्वास से भी जीता जाता है।
  • संगठन और सामूहिक शक्ति में अपार बल होता है – हमें उसे स्वीकारना और साधना चाहिए।

धन्यवाद!
॥हरि: शरणम्॥

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