श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत

श्रीमद्भगवद्गीता रसामृत – एक दिव्य यात्रा की प्रस्तावना

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गणपति वंदना: गोस्वामी तुलसीदास जी की भावसंपन्न स्तुति की अनुभूति

परम पूज्य सदगुरुदेव भगवान के कमल चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम निवेदित करते हुए, तथा सभी संतजनों, वैष्णवों और धर्मप्रेमियों को सप्रेम वंदन करता हुआ — यह दास, भक्तशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास कृत श्री विनय पत्रिका में वर्णित गणपति स्तुति पर आधारित अपना पहला ब्लॉग प्रस्तुत करने का साहस कर रहा है।

इस प्रयास में हुई किसी भी प्रकार की भूल-त्रुटियों के लिए करबद्ध क्षमा-याचना सहित।




गाइए गणपति जगवंदन

(विनय पत्रिका की गणपति स्तुति की संतों की व्याख्या के आधार पर)

तुलसीदास जी कहते हैं —
“गाइए गणपति जगवंदन।”
यह मात्र एक पंक्ति नहीं, अपितु एक साधना का आह्वान है। तुलसीदास जी हमें आमंत्रित करते हैं — आइए, उस विघ्नहर्ता, गणों के स्वामी, जगतवंदनीय प्रभु गणेश का गुणगान करें।

वे यह नहीं पूछते कि आपकी आवाज कैसी है, संगीत की समझ है या नहीं — वे केवल कहते हैं:
“भाव से गाओ, हृदय से गाओ।”
क्योंकि जो गीत हृदय की गहराई से निकलता है, वही प्रभु के हृदय तक पहुंचता है।




कीर्तन और भक्ति: भाव की प्रधानता

तुलसीदास जी का स्पष्ट मत है —
“जहां भाव है, वहीं भगवान हैं।”
गायन, नृत्य, संगीत — ये सब केवल कलात्मक अभ्यास नहीं, भक्ति के वाहक हैं।
जब तक भजन केवल ध्वनि है, वह साधारण है। लेकिन जब उसमें भाव की अग्नि प्रज्वलित होती है — वह साधना बन जाता है, आत्मिक यात्रा बन जाता है।




श्लोक और उसका भावार्थ

अब हम इस स्तुति के प्रत्येक चरण को समझें, जैसे तुलसीदास जी ने अपने भावों में पिरोया है:

> गाइए गणपति जगवंदन
संकर सुवन भवानी नंदन
गणपति, शिव-पार्वती के पुत्र हैं — संकर के सुवन और भवानी के नंदन। वे वही संतान हैं जो मात-पिता को परम आनंद देती है।



> सिद्धि सदन गजवदन विनायक
वे सिद्धियों का निवास हैं। गजवदन यानी हाथीमुखधारी, और विनायक अर्थात मार्गदर्शक — जो विघ्नों को हरते हैं।



> कृपा सिंधु सुंदर सब लायक
वे कृपा के सागर हैं, सौंदर्य और गुणों के अधिकारी — सब लायक।



> मोदक प्रिय मुद मंगलदाता
मोदक उनका प्रिय भोग है, और वे सुख-दाता, शुभदायक देवता हैं।



> विद्यावारिधि बुद्धि विधाता
वे विद्या के समुद्र हैं, बुद्धि के कर्ता हैं। सारी विवेक शक्ति उन्हीं से मिलती है।






तुलसीदास की एकमात्र याचना

> मांगत तुलसिदास कर जोरे
बसहिं रामसिय मानस मोरे
तुलसीदास जी की प्रार्थना कितनी सरल और कितनी गहरी है!
वे कहते हैं — “हे गणपति! मैं हाथ जोड़कर कुछ नहीं मांगता… बस यही विनती है कि मेरे हृदय में श्रीराम और सीता का वास हो।”



न कोई भौतिक इच्छा, न वैभव की कामना — केवल प्रेममय आत्मिक वासना।




गायन से उत्पन्न प्रकाश

जब इस स्तुति को हृदय से गाया जाता है, तो एक अद्भुत अनुभूति होती है।
एक आंतरिक प्रकाश, एक शांति, एक चेतना का उदय।
यह स्तुति फिर केवल पाठ नहीं रहती — यह बन जाती है एक सेतु, जो भक्त को भगवान से जोड़ देती है।




अब एक बार पुनः, भावपूर्वक गाएं यह स्तुति:

> गाइए गणपति जगवंदन
संकर सुवन भवानी नंदन
सिद्धि सदन गजवदन विनायक
कृपा सिंधु सुंदर सब लायक
मोदक प्रिय मुद मंगलदाता
विद्यावारिधि बुद्धि विधाता
मांगत तुलसिदास कर जोरे
बसहिं रामसिय मानस मोरे
बसहिं रामसिय मानस मोरे।






समापन वंदना

आपका हृदय भी भगवान श्री सीताराम के वास से प्रकाशित हो — यही विनम्र कामना।

गणेश भगवान की जय।
सियावर रामचंद्र की जय।
उमापति महादेव की जय।
गोस्वामी तुलसीदास की जय।
सब संतन की जय।
सब विप्रन की जय।

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